एन आई एन,

पिथौरागढ़। पहाड़ की पगडंडियों से निकलकर देश की राजनीति के शिखर तक पहुंचने वाले पं. गोविंद बल्लभ पंत केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि पहाड़ के स्वाभिमान की आवाज थे। अंग्रेजी हुकूमत के दौर में जब उत्तराखंड के लोगों को कुली बेगार जैसी अमानवीय प्रथा का दंश झेलना पड़ता था, तब पंत ने इसके खिलाफ उठी जनआवाज को मजबूती देने में अहम भूमिका निभाई।

कुली बेगार प्रथा में ग्रामीणों को अंग्रेज अफसरों और उनके सामान को ढोने के लिए मजबूर किया जाता था। इसके बदले उन्हें कोई पारिश्रमिक नहीं मिलता था। धीरे-धीरे यह व्यवस्था पहाड़ के लोगों के आत्मसम्मान पर चोट बन गई। वर्ष 1921 में बागेश्वर में सरयू तट पर उमड़ा जनसैलाब इसी शोषण के खिलाफ निर्णायक हुंकार बना। पं. पंत ने आंदोलन को संगठित करने और जनता में जागृति पैदा करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

कुली बेगार आंदोलन महज एक प्रथा के विरोध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह पहाड़ के स्वाभिमान और स्वतंत्रता चेतना का प्रतीक बन गया। लोगों ने बेगार में इस्तेमाल होने वाला सामान तक सरयू में प्रवाहित कर अंग्रेजी शासन को स्पष्ट संदेश दिया कि अब शोषण स्वीकार नहीं किया जाएगा।

स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के बाद पं. गोविंद बल्लभ पंत उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने और बाद में देश के गृहमंत्री के रूप में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 1957 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।



Share on Facebook Share on WhatsApp